यह किताब एक व्यापक पाठ्यपुस्तक है, जो समकालीन समाज में अपराध, दंड और न्याय के विकसित होते आयामों का अन्वेषण करती है। अब अपने छठे संस्करण में, इस पुस्तक को हाल के विधायी विकासों, न्यायिक घोषणाओं और आपराधिक कानून एवं सामाजिक नीति में उभरते दृष्टिकोणों को प्रतिबिंबित करने के लिए व्यापक रूप से संशोधित और अद्यतन किया गया है। एक स्पष्ट और विश्लेषणात्मक शैली में लिखी गई यह पुस्तक कानून, अपराध विज्ञान, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, पुलिस प्रशासन के छात्रों और न्यायिक अभ्यर्थियों के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करती है।
इस संस्करण में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 और पॉक्सो (संशोधन) अधिनियम, 2019 को शामिल किया गया है। साथ ही, इसमें उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों पर चर्चा की गई है, जैसे:
जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (व्यभिचार पर धारा 497 IPC को रद्द करना),
नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना),
तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ (मॉब लिंचिंग पर दिशा-निर्देश),
इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ (नाबालिगों के साथ वैवाहिक बलात्कार को मान्यता देना),
कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (गरिमा के साथ मरने के अधिकार को कायम रखना)।
इन मामलों का विश्लेषण संवैधानिक नैतिकता, मानवाधिकारों और न्याय एवं पीड़ित संरक्षण की विकसित होती धारणाओं के आलोक में किया गया है।
यह पुस्तक अनुभवजन्य आंकड़ों (empirical data) और आलोचनात्मक टिप्पणी द्वारा समर्थित अपराधशास्त्रीय सिद्धांतों, दंडात्मक सुधारों, सुधारात्मक प्रशासन, पीड़ित मुआवजे और पुनर्स्थापनात्मक न्याय (restorative justice) पर एक संतुलित चर्चा प्रस्तुत करती है। यह आपराधिक व्यवहार, सामाजिक परिवर्तन और कानूनी प्रतिक्रिया के बीच अंतर्संबंधों को रेखांकित करती है, जो इसे भारतीय संदर्भ में अत्यधिक प्रासंगिक बनाती है।
व्यापक रूप से अद्यतन, वैचारिक रूप से समृद्ध और सरल एवं विद्वत्तापूर्ण भाषा में लिखा गया यह संस्करण एक विश्वसनीय शैक्षणिक संसाधन और उन लोगों के लिए एक मानक संदर्भ बना हुआ है जो आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणालियों में अपराध, दंड और पीड़ित अधिकारों की गहरी समझ चाहते हैं।

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